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NNWN/29/09/2020

भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के 50 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में ‘Discourse series’ शीर्षक से चर्चा-परिचर्चा की एक श्रृंखला का आयोजन किया गया है।
एम्स निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया ने कहा कि “कोविड-19 के दौरान हमें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि लोगों को ठीक रखें और उनमें जागरूकता लाएं कि किस तरह से वह अपना ख्याल रख सकते हैं और इस महामारी से अपना बचाव कर सकते हैं। कई संभ्रांत और पढ़े लिखे व्यक्ति अब भी कुछ मिथक में फंसे हुए हैं, जिसकी वजह से वह इस महामारी की चपेट में आते जा रहे हैं।”
पब्लिक हेल्थ सेक्टर में निवेश करने के साथ ही निवेश के सही तरीके को जानने की जरूरत पर बल देने के बाद डॉ गुलेरिया ने बताया कि कोविड-19 महामारी के दौरान कुछ आश्चर्यजनक तथ्य सामने आए हैं, जैसे कि कुछ लाइफस्टाइल डिसऑर्डर्स में कमी पायी गई है। लोगों के घर में रहने, घर का खाना खाने और हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाने की वजह से उनकी इम्यूनिटी बूस्ट हुई है। इसकी वजह से लोग कम बीमार पड़े हैं। महामारी के प्रति लोगों को आगाह करते हुए डॉ रणदीप गुलेरिया ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस वायरस से फिलहाल छुटकारा संभव नहीं है। ऐसे में, इसके साथ ही न्यू नॉर्मल की ओर जिंदगी बढ़ानी होगी और इस दौरान कई चुनौतियों का सामना भी करना होगा।
परिचर्चा में अपनी बात रखते हुए नैसकॉम की प्रेसिडेंट देबजानी घोष ने बताया कि आपदा में अवसर की बात इस वक्त हर कोई कर रहा है। लेकिन, अवसर तभी होते हैं जब हम उसे देखते हैं और यह तभी हो सकता है जब हम सामान्य से हटकर कुछ देखें। कोविड-19 के संक्रमण काल के बाद हमारे पास यह एक अवसर है कि हम 'न्यू नॉर्मल' को बना सकें। हर कोई न्यू नॉर्मल शब्द पर बात तो कर रहा है, लेकिन इसमें टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कैसे किया जाए, इस पर भी बात की जानी चाहिए। घोष ने कहा कि टेक्नोलॉजी को अब हम तमाम तरह से अपनी जीवनशैली में शामिल कर चुके हैं, लेकिन इसे बड़े पैमाने पर अपने जीवन में शामिल करने और कोविड-19 के संक्रमण के बाद का हिस्सा बनाने के लिए चार मुख्य तथ्यों पर काम करना बेहद जरूरी होगा। ये चार तथ्य हैं- विश्वास, प्रतिभा, लोगों द्वारा किये जा रहे नवाचार और उत्साह। इन चारों पहलुओं के मिशन से ही आत्मनिर्भर भारत का निर्माण सही दिशा में संभव है।
विज्ञान प्रसार द्वारा आयोजित किये गए इस विशेष वेबिनार कार्यक्रम को इंडिया साइंस और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लोगों द्वारा बड़ी संख्या में देखा गया। (इंडिया साइंस वायर)

NNWN/27/09/2020

कोरोना वायरस के मामले में भी स्थिति अलग नहीं है। कोरोना वायरस से लड़ने के लिए नए तरीके खोज रहे वैज्ञानिक यह पता लगाने के लिए दिन-रात अध्ययन कर रहे हैं कि इस वायरस के कितने अनुवांशिक समूह भारत में सक्रिय हो सकते हैं।

वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के वैज्ञानिकों ने कहा है कि भारत का कोरोना क्लैड दुनिया में फैल रहे कोरोना रूपों से 70 प्रतिशत तक मिलता-जुलता है। हैदराबाद स्थित सीएसआईआर की घटक प्रयोगशाला सेंटर फॉर सेलुलर ऐंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (सीसीएमबी) के वैज्ञानिकों द्वारा किए जा रहे एक अद्यतन अध्ययन में यह बात उभरकर आई है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि दुनियाभर में फैले वायरस की अनुवांशिक संरचना में समानता का अर्थ है कि इस वायरस के नियंत्रण के लिए अलग-अलग दवाओं या फिर वैक्सीन की जरूरत नहीं होगी। ऐसी स्थिति में एक ही वैक्सीन या दवा इस वायरस से लड़ने के लिए पर्याप्त हो सकती है।

भारत में कोरोना वायरस का A2a क्लैड सबसे अधिक हावी है, जिसमें दुनियाभर में अब तक अध्ययन किए गए जीनोम से 70 प्रतिशत तक समानता पायी गई है। इससे पहले, भारत में व्याप्त A3i क्लैड में आई गिरावट के बाद महामारी के लिए जिम्मेदार A2a क्लैड में वृद्धि देखी गई है।

कोरोना वायरस के जीनोम का अध्ययन कर रहे सीसीएमबी के वैज्ञानिकों के मुताबिक वैश्विक स्तर पर वायरल जीनोम में समानता का मतलब है कि A2a क्लैड में रूपांतरण को लक्षित करने वाली कोई एक वैक्सीन या दवा पूरे विश्व में समान प्रभाव के साथ काम करेगी। वर्तमान में, नये कोरोना वायरस के सभी भारतीय जीनोम सहित  वैश्विक स्तर पर चिह्नित किए गए लगभग 70% जीनोम इसी क्लैड (A2a) के अंतर्गत आते हैं।

सीसीएमबी के निदेशक डॉ. राकेश के मिश्रा ने कहा है कि “जैसा कि इस क्लैड के अधिक संक्रामक होने की आशंका थी, A2a जल्दी ही हर जगह की तरह भारत में भी प्रमुख रूप से फैलने वाला क्लैड बन गया। वैश्विक स्तर पर वायरल जीनोम में समानता को एक सकारात्मक खबर माना जाना चाहिए, क्योंकि इस रूपांतरण को लक्षित करने वाली एक वैक्सीन या एक दवा पूरी दुनिया में समान प्रभाव के साथ काम करेगी।”

हालांकि, डॉ मिश्रा ने यह भी कहा है कि अभी इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि यह रूपांतरण चिकित्सीय रूप से कितना जटिल हो सकता है। वर्तमान में किसी भी क्लैड का संबंध निर्णायक रूप से कोविड-19 के अधिक गंभीर या मृत्यु के जोखिम में वृद्धि के साथ जुड़ा नहीं पाया गया है।

नई दिल्ली स्थित सीएसआईआर-जिनोमिकी और समवेत जीव विज्ञान संस्थान (आईजीआईबी) और सीसीएमबी के वैज्ञानिकों द्वारा संयुक्त रूप से किए गए इस अध्ययन के नतीजे ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस की शोध पत्रिका ओपेन फोरम इन्फेक्शियस डीजीज में प्रकाशित किए गए हैं।

इससे पहले जून में, शोधकर्ताओं ने भारतीय आबादी में एक अलग वायरस की मौजूदगी का खुलासा किया था। इसे क्लैड I/A3i नाम दिया गया था। इस वायरस को उसकी आनुवंशिक बनावट में चार विशिष्ट भिन्नताओं की उपस्थिति से पहचाना जाता है। उल्लेखनीय है कि सीएसआईआर-(सीसीएमबी) के वैज्ञानिक भारतीय आबादी में फैल रहे कोरोना वायरस के दो हजार से अधिक जीनोम का विश्लेषण कर चुके हैं। (इंडिया साइंस वायर)

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(EXCLUSIVE)

India’s Covid curve is being closely watched by the government and health experts. Over eight crore tests have been conducted in India so far and around 80 lakh tests were conducted in the last week. Questions are being asked about the challenges before the government and health experts, role of communication in spreading awareness about Coronavirus, its implications and vaccine related research.

Anju Grover for Ngonewsworld spoke to Strategic Health Communication Expert Dr. Deepak Gupta on the challenges, vaccine and communication hurdles. Dr Gupta is a senior adviser - for over 25 years - with various agencies of the UN system in Asia and the Pacific on Strategic Health Communication issues.

Q: How do you perceive the current outreach and communication during the pandemic?

A: Many scientific studies demonstrate, much of the growth in the field of health communication was stimulated by the AIDS response that started in the decade of 80s, when there was no antiretroviral treatment and the only tool available was prevention through focused social and behavior change. It is also noteworthy that the earlier gathered communication lessons and experiences for improving maternal & child survival and for encouraging family planning underpinned these early HIV prevention communication strategies. As we are still evolving with it, neither clinical treatment nor vaccination for Covid 19 is available as yet. Preventive behaviour is the only way recommended by the health experts, especially WHO and the respective national health departments. Therefore, current pandemic is primarily a ‘Behaviour Practices’ challenge which can be handled by the Strategic communication techniques.

Q: Do you foresee challenges for health communication experts after vaccine for Coronavirus is available in the market?

A: The public health programmes have been struggling for many decades in reaching out to communities and delivering the vaccination programmes. Despite the efforts invested in the supply aspects of vaccinations, social scientists continue to face challenges with the demand generation dimensions of the immunization programmes. Social scientists will face challenges when vaccines are out in the market. Hence, equity i.e. equitable access to all will be a major challenge to the respective governments and public health community.  Therefore, a significant emphasis on the ‘health seeking behavior’ aspects in communities plays a significant role in achieving nearly cent percent immunization coverage. Let’s not forget there are a huge number of anti-vaxxers who disregard the usefulness of the vaccines for multiple preventable diseases.  

Q: How, according to you, governments can overcome Covid-19 vaccination challenges?   

 A: The global vaccination coverage remains at 85%, with no significant change visible in the past several years. It has rather deteriorated in the recent years. A considerable large size of population continues to pose a major challenge as it suffers from limited access to immunization services. The gap in immunization coverage amongst well and poorly performing countries, is widening annually. For example, polio still continues to be endemic in a couple of countries, while the newer vaccines still throw a challenge of low uptake in many regions across the world. Poor access to health facilities or lack of it and vaccination programmes, insufficient and inappropriate use of available resources, poor technical capacity and least empowered immunization decision-making bodies, lack of political will, civil conflict and war, and natural disasters – all of these contribute to under-immunization. Therefore, there are two dimensions, i.e. ensuring equitable supply/access and logistics and the ‘demand-generation’/positive behaviour change marketing strategies.

Covid-19 vaccination will be no exception. It will pose a mammoth logistics’ challenge to the countries. Yes, in some select communities the demand-generation aspects, i.e. making communities accept Covid-19 vaccination will throw a mammoth challenge to the communication experts.   

 Q: Your comments on authorities facing difficulties in conveying behaviour-change/practice messages in the current context?

 A: The overall paradigm of strategic communication remains absolutely same, while the core methodologies and strategies change in case of disasters, pandemics and outbreaks, We cannot strategise to communicate pandemic messages the way we have designed communication interventions for sexual & reproductive health (SRH), age-at-marriage, family planning or even promoting breastfeeding. Some risk communication frameworks have been potentially employed in deciphering the challenges of wide-spread disease control and pandemics. When people are really concerned, stressed, or outrageously upset, they want to know that you care before they care what you know (Trust Determination Theory); When people have difficulty in hearing, understanding, and remembering bulk of information and thus they focus most on what they hear first (Mental Noise Theory); And again when people are highly stressed, or upset, they often focus more on the negative than on the positive (Negative Dominance Theory); Similarly, the gaps between risk perceptions and reality often become wider during such difficult times (Risk Perception Theory). At different stages of pandemic or an outbreak, these core communication frameworks serve as a common denominator in planning and designing activities. Unfortunately, most agencies are either withholding or rolling-out bulk of information without taming its purpose, targeting audiences and tailoring the messages. Let’s remember, we are walking a tight rope and it’s a tough call between ‘life and livelihoods…’! There is a need of local leaders, trusted and credible celebrities to reach out to masses with customised do’s and don’ts. Leaders not wearing a mask on TV send a wrong signal.

 It can be easily construed that the success of risk communication of the pandemic is dependent on: (1) Timeliness of communication, (2) Simplicity, directness and consistency of the message, (3) Appropriateness of the channels/tools, (4) Transparency of information, and (5) Public faith in the communicator.

 Q: Do you think India and other countries are doing well in the outreach, public education and positive behaviour change aspects?

 A: The pandemic is primarily a “behavioural practices” issue. Most people will adopt practices as are being transmitted by the credible and trusted sources, while there will always be a few hard-core ‘laggards’ who defy acceptance of any positive change. Such segment of population, of course, have their own reasons based on myths, rumours or incorrect beliefs. Let’s understand that this virus is an absolute new pathogen which is, even after nearly a year, still being researched and studied. Therefore, for months together the leading health agencies, respective national health departments, scientific community, clinicians and epidemiologists have struggled to find the real mode of transmission, correct therapeutic/clinical treatment protocols and the vaccination. The initial mess included delay in declaring the pandemic and the immediate next was discouraging use of face-masks barring exception of health providers! Promoting “avoidance of face-mask” did a huge damage in terms of spread of virus. Going by the data, whatever is available, India is relatively better positioned in terms of case mortalities.   

Unfortunate that it may sound, the highly technical area of public health communication or the risk-communication is still being largely managed by the generalists and in some contexts, even has assumed a level of titled ‘political communication’ in many countries. I wish to see more science in politics than politics in science!